हमें अपने धर्म के प्रति गंभीर होना चाहिए,हमारे हिंदू धर्म में पृथ्वी पर उपस्थित प्रत्येक जीव,वनस्पति,धातुओं आदि का अपने आप में बहुत महत्व है
विज्ञान वर्ग से अध्ययन कर रहे छात्रों को इन विषयों पर अध्ययन करना चाहिए क्योंकि हमारी प्रत्येक वस्तु,जीव धातु,वनस्पति,दिशाएं,वास्तुशास्त्र,तर्कसंगत है
यूं तो पिटारा सैकड़ों वर्षों से धनी लोगों द्वारा अपनी बहुमूल्य वस्तुओं,गहनों,धन आदि को रखने वाला एक प्रमुख सुरक्षा पात्र रहा है व कीमती लकड़ी,बांस,धातुओं आदि से निर्मित होता हैं। जिसे कोई आसानी से भेद नही सकता।
परन्तु हमारे उत्तराखण्ड में पिटारा(स्थानीय भाषा में पिटरु) विशेषतः देवी-देवताओं के पूजा-पाठ से संबंधित बहुमूल्य वस्तुओं को रखने वाला एक ऐसा पवित्र पात्र होता है,जिसे बौना बांस(Dwarf Bamboo) उत्तराखण्ड की बोली-भाषा में रिंगाल,रिंगळु,रिंगाव,आदि नामक बहु-उपयोगी वनस्पति से यहाँ के हस्तशिल्प,शिल्पकारों द्वारा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे-
सुप,टोकरी,डलिया,ड्वारा,शगुन कंडी(अनाज रखने वाले,अन्य कृषि कार्यों व रीति-रिवाजों वाले पात्र) के साथ बड़ी ही सुन्दर हस्तकला के प्रदर्शन द्वारा तैयार किया जाता है। हमारे क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ,लाखों लोगों की गहरी आस्था,श्रद्धा व विश्वास की देवी मां भगवती कालिंका के विशाल धार्मिक यात्रा में मां भगवती की प्रतिमा न्याजा के साथ-साथ चलने वाला पिटारा,मां भगवती की पूजा से संबंधित वस्तुओं,प्रतिष्ठित श्रृंगार गहनों,छत्र आदि से युक्त,व चांदी के छत्रों,फूलों की मालाओं से सुसज्जित एक पवित्र पात्र होता है।
माँ भगवती की यात्रा में बड़ी श्रद्धा व भक्तिभाव से इस पवित्र पात्र(पिटारा) को पीठ व कंधों के सहारे,पांवों में बिना चप्पल-जूते पहने ले जाया जाता है।
माँ भगवती की कृपा से बिना किसी कठिनाई के यात्रा में सम्मिलित भक्त,श्रद्धालु इस पवित्र,व भारी पात्र को बड़ी सरलता से पहाडों के पथरीली,पाले व बर्फ से युक्त रास्तों पर ले जाते हैं।
हमें अपने धर्म के प्रति गंभीर होना चाहिए,हमारे हिंदू धर्म में पृथ्वी पर उपस्थित प्रत्येक जीव,वनस्पति,धातुओं आदि का अपने आप में बहुत महत्व है।
विज्ञान वर्ग से अध्ययन कर रहे छात्रों को इन विषयों पर अध्ययन करना चाहिए क्योंकि हमारी प्रत्येक वस्तु,जीव धातु,वनस्पति,दिशाएं,वास्तुशास्त्र,तर्कसंगत है।
वर्तमान में बहुत सी धातुओं,वनस्पतियों,व जीवों पर विदेशी कंपनियां खोज कर रही हैं व उनसे संबंधित उत्पादों का व्यापार कर रहे हैं,जबकि हजारों वर्ष पूर्व हमारे ॠषि-मुनियों ने इन सभी धातुओं,वनस्पतियों व जीवों का अध्ययन व खोज कर हमें इनका महत्व बताया था।
चमरी गाय या याक एक पशु है जो तिब्बत के ठण्डे तथा वीरान पठार,नेपाल और भारत के उत्तरी भाग लेह-लद्दाख के क्षेत्रों में पाया जाता है। यह काला,भूरा,सफेद या धब्बेदार रंग का होता है। इसका शरीर घने,लम्बे और खुरदुरे बालों से ढका हुआ होता है। इसे स्थानीय भाषा में 'चमरी' या 'चँवरी' या 'सुरागाय' भी कहते हैं। इन क्षेत्रों में इसको दूध के लिए पाला जाता है।
पिटारे के पीछे यात्रा में सम्मिलित एक व्यक्ति चँवरी गाय की पूंछ से निर्मित बालों के एक गुच्छे को,जिसे हम अपनी स्थानीय भाषा में चौंर गाय का पूंछ कहते हैं को लेकर चलता है,जिसे पवित्र पात्र पिटारे पर हाथ में लेकर मध्यम गति से दायें से बायें वायु प्रदान की जाती है ताकि पवित्र पात्र पर कोई अनावश्यक अपवित्र कीटाणु न आ पाए। इसके अतिरिक्त मंदिरों व गुरुद्वारों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
उत्तराखण्ड के प्रत्येक गांवों,घरों में इस प्रकार के पवित्र पात्र होते हैं जिनमें देवी-देवताओं के पूजा-पाठ की उपयोगी वस्तुओं,वर्तनों का भंडार होता है। Post by- जगमोहन पटवाल थबड़िया मल्ला,बीरोंखाल पौड़ी गढ़वाल
विज्ञान वर्ग से अध्ययन कर रहे छात्रों को इन विषयों पर अध्ययन करना चाहिए क्योंकि हमारी प्रत्येक वस्तु,जीव धातु,वनस्पति,दिशाएं,वास्तुशास्त्र,तर्कसंगत है
यूं तो पिटारा सैकड़ों वर्षों से धनी लोगों द्वारा अपनी बहुमूल्य वस्तुओं,गहनों,धन आदि को रखने वाला एक प्रमुख सुरक्षा पात्र रहा है व कीमती लकड़ी,बांस,धातुओं आदि से निर्मित होता हैं। जिसे कोई आसानी से भेद नही सकता।
परन्तु हमारे उत्तराखण्ड में पिटारा(स्थानीय भाषा में पिटरु) विशेषतः देवी-देवताओं के पूजा-पाठ से संबंधित बहुमूल्य वस्तुओं को रखने वाला एक ऐसा पवित्र पात्र होता है,जिसे बौना बांस(Dwarf Bamboo) उत्तराखण्ड की बोली-भाषा में रिंगाल,रिंगळु,रिंगाव,आदि नामक बहु-उपयोगी वनस्पति से यहाँ के हस्तशिल्प,शिल्पकारों द्वारा अन्य उपयोगी वस्तुओं जैसे-
सुप,टोकरी,डलिया,ड्वारा,शगुन कंडी(अनाज रखने वाले,अन्य कृषि कार्यों व रीति-रिवाजों वाले पात्र) के साथ बड़ी ही सुन्दर हस्तकला के प्रदर्शन द्वारा तैयार किया जाता है। हमारे क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ,लाखों लोगों की गहरी आस्था,श्रद्धा व विश्वास की देवी मां भगवती कालिंका के विशाल धार्मिक यात्रा में मां भगवती की प्रतिमा न्याजा के साथ-साथ चलने वाला पिटारा,मां भगवती की पूजा से संबंधित वस्तुओं,प्रतिष्ठित श्रृंगार गहनों,छत्र आदि से युक्त,व चांदी के छत्रों,फूलों की मालाओं से सुसज्जित एक पवित्र पात्र होता है।
माँ भगवती की यात्रा में बड़ी श्रद्धा व भक्तिभाव से इस पवित्र पात्र(पिटारा) को पीठ व कंधों के सहारे,पांवों में बिना चप्पल-जूते पहने ले जाया जाता है।
माँ भगवती की कृपा से बिना किसी कठिनाई के यात्रा में सम्मिलित भक्त,श्रद्धालु इस पवित्र,व भारी पात्र को बड़ी सरलता से पहाडों के पथरीली,पाले व बर्फ से युक्त रास्तों पर ले जाते हैं।
हमें अपने धर्म के प्रति गंभीर होना चाहिए,हमारे हिंदू धर्म में पृथ्वी पर उपस्थित प्रत्येक जीव,वनस्पति,धातुओं आदि का अपने आप में बहुत महत्व है।
विज्ञान वर्ग से अध्ययन कर रहे छात्रों को इन विषयों पर अध्ययन करना चाहिए क्योंकि हमारी प्रत्येक वस्तु,जीव धातु,वनस्पति,दिशाएं,वास्तुशास्त्र,तर्कसंगत है।
वर्तमान में बहुत सी धातुओं,वनस्पतियों,व जीवों पर विदेशी कंपनियां खोज कर रही हैं व उनसे संबंधित उत्पादों का व्यापार कर रहे हैं,जबकि हजारों वर्ष पूर्व हमारे ॠषि-मुनियों ने इन सभी धातुओं,वनस्पतियों व जीवों का अध्ययन व खोज कर हमें इनका महत्व बताया था।
चमरी गाय या याक एक पशु है जो तिब्बत के ठण्डे तथा वीरान पठार,नेपाल और भारत के उत्तरी भाग लेह-लद्दाख के क्षेत्रों में पाया जाता है। यह काला,भूरा,सफेद या धब्बेदार रंग का होता है। इसका शरीर घने,लम्बे और खुरदुरे बालों से ढका हुआ होता है। इसे स्थानीय भाषा में 'चमरी' या 'चँवरी' या 'सुरागाय' भी कहते हैं। इन क्षेत्रों में इसको दूध के लिए पाला जाता है।
पिटारे के पीछे यात्रा में सम्मिलित एक व्यक्ति चँवरी गाय की पूंछ से निर्मित बालों के एक गुच्छे को,जिसे हम अपनी स्थानीय भाषा में चौंर गाय का पूंछ कहते हैं को लेकर चलता है,जिसे पवित्र पात्र पिटारे पर हाथ में लेकर मध्यम गति से दायें से बायें वायु प्रदान की जाती है ताकि पवित्र पात्र पर कोई अनावश्यक अपवित्र कीटाणु न आ पाए। इसके अतिरिक्त मंदिरों व गुरुद्वारों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
उत्तराखण्ड के प्रत्येक गांवों,घरों में इस प्रकार के पवित्र पात्र होते हैं जिनमें देवी-देवताओं के पूजा-पाठ की उपयोगी वस्तुओं,वर्तनों का भंडार होता है। Post by- जगमोहन पटवाल थबड़िया मल्ला,बीरोंखाल पौड़ी गढ़वाल

