माँ कालिंका जतोडा

माँ कालिंका जतोडा
माँ कालिंका के जातोड़े की शुरवात माँ काली के मुख्य निवास स्थान कोठा तल्ला से होती है।
कालिंका के पुजारी जखोला के पंडित (ब्राह्मण) है | जो ममगई भी कहलाते है यह जखोल गाँव, थलीसैण के पास स्थित है। जिन्हें कालिंका पूजन की जिमेदारी दी गई है | ममगई पंडित मंदिर के पूजन का सुभारम्भ करते है | ये पंडित बहुत ज्ञानी है जो पूजा पूरी विधि विधान से करते चले आ रहे है |
माँ कालिंका का जतोडा दिसंबर और जनवरी के बीच में मंगलबार या शनिबार के दिन होता है| १४ गाँव के भाइचारे और प्रेम से सभी १४ के बड्यारी भाई आपस मे मिल कर पूजा करते है |
अब १४ गाँव की मीटिंग हर महीने होती है | और इसी प्रकार जतोडे (मैले) के लिए सभी बड्यारी भाई ( माँ का बुलावा ) आपस में मिल कर पहले मीटिंग की करते है (जतोड़ा होना है या नहीं कारणवश माँ की कृप्या से) उस मीटिंग में यह तय किया जाता है की २ से ३ लोगो को जखोला भेजा जाए जो अपने ममगई सभी पुजारी पंडित के सामने प्रस्ताव रखे |वो जखोला जा कर सभी पंडितो से मिल कर प्रस्ताव रखते है और तब सभी पंडितो द्वारा शुभ तिथि निकली जाती है | जखोला में ६० से ६५ ब्राह्मणो के परिवार रहते है जो सभी पूजा मे शामिल होते है। और उसके बाद बड्यारी भाई वापिस आ एक बार फिर मीटिंग में तिथि को बता कर सुनाते है । और इस प्रकार सभी बड्यारी भाई पूजा की प्रक्रिया (तैयारी) में लग जाते है |
इसके बाद ओजी (ढोल दमाऊ) बजने वाले गुरु को न्योता दिया जाता है ओजी वो होते है जो डोल दमाऊ बजाते है और देवता पूजन और जागरण करवाते है | ये ढोल दमाऊ बजा कर पूजा की शुरुवात करते है ओजी (गुरु) पूजा में एक मुख्य भूमिका निभाते है |
पूजा का आरम्भ कोठा तल्ला से होता है | जो माँ भगवती का मुख्य निवास स्थान है। जिसमे ११ दिन तक यात्रा की जाती है| यह निर्भर करता है की शुभदिन या तो मंगलवार हो और या तो शनिवार हो | पहले जो यात्रा २ महीने या ३ महीने की होती थी अब उस यात्रा को सीमित कर के १४ गाओं के अंदर ही रखा गया है।
बड्यारी वंसज माँ की पूजा माँ के बुलावे और आशीर्वाद से हर 2 से 3 साल में करवाते है | एक दिन पहले माँ का पूजा होती है जिसे हम (कौथिक) कहते है | इसमें सभी १४ गाँव की शांति की कामना और यात्रा को शुभ-आरम्भ करने के लिए की जाती है। फिर अगले दिन हम सब माँ भगवती की संरचना (न्याजा भगवान का एक रूप दे कर) के साथ १४ गाँव में यात्रा करते है जिसे ग्रामीण निवासी (क्षेत्र) न्याजा भी कहते है | पहले दिन सूर्य उदय (सूर्य की पहली किरण) के साथ माँ भगवती के संरचना बनाने के बाद, भगवती के दर्शन सभी भक्तो को कराये जाते है | (भगवती निकलती है) और फिर यात्रा शुरू हो जाती है | पहले दिन कोठा तल्ला से कोठा मल्ला तक की यात्रा होती है | और दूसरे दिन सुबह कोठा मल्ला से तिमलखोली से थाबाड़िया, थाबाड़िया से मरखोला, मरखोला से बंदरकोट तल्ला, बंदरकोट तल्ला से बंदरकोट मल्ला, बंदरकोट मल्ला से तलसेड़ी सैन, तलसेड़ी सैन से रानी डेरा, रानी डेरा से शिव मंदिर (कुलान्तेश्वर शिवालय) जा कर ठन्डे पानी से स्नान करके,सभी पूजा की सामग्री का पुजन एवम शुद्धिकरण किया जाता है ।फिर बाखली की और प्रस्थान होते है, बाखली से मटकानी, मटकानी से लखोरा मल्ला, लखोरा मल्ला से बिचल बाखळी और बिचल बाखळी से कोठा तल्ला, इस प्रकार यात्रा पूरी हो जाती है | इस तरह पुरे १४ गाँव की यात्रा पूरी हो जाती है जिसे सभी क्षेत्रवासी कैरी के भीतर की यात्रा कहते है | इसी दिन छोटा जतोडा शाम को होता है और अगले दिन सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ माँ कालिंका मंदिर की ओर प्रस्थान किया जाता है |
मंदिर में एक विशेष स्थान पर माँ भगवती रहती है और सभी भक्त माँ का भव्य दर्शन करते है | जातोडे में भक्त बहुत दूर दूर से लोखो की संख्या में आते है।
भक्त अपने साथ चावल, नारियल चुन्नी अगरबती धुप बत्ती ले कर माँ के चरणो में रखते है
हमारी बड्यारी बहने चावल लाती है जीने हम (दीशा) भी कहते है |

यह मेला (जतोडा)सुबह ६ से शाम ४ बजे तक लगता है जिसमे दुकानदार अपनी अलग अलग दुकाने लगते है| अपने खान पान के साथ आपस में खुशियाँ बाटते है | यहाँ पर जलेबी को प्रमुख मिठाई के रूप में मानते है | लगभग सभी लोग जलेबी का आनंद लेते है | अंत में जतोड़े का समापन का समय आ जाता है ४ बजते ही माँ भगवती को वापिस अपने स्थान में ले जाया (कोठा तल्ला) जाता है| सभी लोग अपने अपने घर को प्रस्थान हो जाते है |

और अगले दिन पंडित पूरी प्रकिया के साथ हवन, पूजा, गों दान के साथ जतोड़े समापन किया करता है ।अंत मे 14 गाँव मे एक और पूजा होती है जिसे क्षेत्र निवासी डल्ली कहते है | इस प्रकार पूरी प्रकिया एक महीने तक चलती है और माँ भगवती के आशीर्वाद से पूजा का समापन होता है सभी भक्तो पर माँ की छाया और माया बनी रहती है।इस प्रकार पूरी प्रकिया एक महीने तक चलती है और माँ बुलावा आने पर जतोड़ा होता है

