जानिए आखिर श्राद्ध क्यों दिए जाते है?
शास्त्रों में कहा जाता है कि ''श्रद्धया इदं श्राद्धं'' अर्थात - श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए वह श्राद्ध है।
पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ जैसे- दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) आदि अर्पण किया जाता है।
ऋण श्राद्ध कर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग बताया गया है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण की आत्माएं प्रसन्न होती हैं।
प्रतिवर्ष भाद्रपद, शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं।
हमारे 14 गांव के बरियारी वंसज को अपने पूज्य लैली बूबा जी के श्राद्ध देने का अवसर मिलता है। और उनका आशीर्वाद की भी प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में 3 ऋण बतलाए गए हैं-
1. देव ऋण, 2. ऋषि ऋण और 3. पितृ ऋण।
देव ऋण ईश्वर के लिए जो कुछ श्रद्धा से अर्पण करना चाहे कर सकते हैं।
पितृ ऋण श्राद्ध से तात्पर्य हमारे मृत पूर्वजों व संबंधियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान प्रकट करना है।
दिवंगत व्यक्तियों की मृत्यु तिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि इन तिथियों में हमारे पितृगण इस पृथ्वी पर अपने-अपने परिवार के बीच आते हैं। तब श्राद्ध करने से हमारे पितृगण प्रसन्न होते है हमारा सौभाग्य बढ़ता है। और उनका आशीर्वाद में मिलता है।
धन्यवाद!
लेखक: योग गुरु नरेश सिंह
गांव: तिमला खोली, जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

