देवदार का वृक्ष (Cedar tree)
साल में एक बार करें पुण्य का काम।
पुस्तों तक मिलें दुवाएं और रहे नाम।।
दोस्तों देवदार के वृक्ष से आप लोग अच्छी तरह से परिचित होंगे, यह अपनी सुंदरता, मान्यता और सुगंध के लिए विश्व भर में विख्यात है।
हम चाहते हैं कि गढ़वाल और कुमाऊं के मध्य महाकाली क्षेत्र में भी देवदार के वृक्ष होने चाहिए।
देवदार के वृक्ष बहुत सुंदर, 12 महीने हरे भरे रहते हैं, दूर-दूर तक इसकी सुगंध फैलती है जो वातावरण को शुद्ध कर देती है और यहां की जलवायु देवदार के लिए बहुत अच्छी है इसके लिए ज्यादा, खाद पानी व मेंटेनेंस की भी जरूरत नहीं।
क्षेत्र में देवदारू के पेड़ लगाने के लिए लगाने के लिए लोगों में जागरूकता की एक मुहिम चलाना पड़ेगा। इसके लिए कुछ खास नहीं करना है बल्कि साल भर में 1 दिन अपने जन्मदिन पर महाकाली क्षेत्र में एक देवदार का वृक्ष जरूर लगा कर आए।
इस क्षेत्र को साफ सुथरा और सुंदर पर्यटक स्थल बनाने में हम सब का महत्वपूर्ण योगदान होना चाहिए।
हम समस्त श्रद्धालुओं से अनुरोध करते हैं कि जब भी आपको मंदिर दर्शन करने का सुनहरा मौका मिले तब श्रद्धा हेतु, सुंदरीकरण के लिए देवदार का एक वृक्ष जरूर लगाएं।
वृक्ष लगाने से पहले मंदिर के चौकीदार या पुजारी जी से पौधा लगाने की जगह सुनिश्चित कर लें, ताकि रिकॉर्ड लिस्ट में आपका नाम शामिल हो सकें।
आपने देखा होगा की महाकाली क्षेत्र में बांझ (Oak), बुरांश (Rhododendron arboreum), चीड़ (Pine) के बहुत पेड़ हैं और इनसे भी ज्यादा सुंदर देवदार का पेड़ होता है। देवदार के वृक्षों से हमारे मंदिर क्षेत्र की और सुंदरता बढ़ेगी।
देवदार 'पिनाएसिई' वंश का सदा हरा-भरा और बहुत वर्षों तक जीवित रहने वाला वृक्ष है। देवदार साधारणत: ढाई से चार मीटर के घेरे वाले पेड़ है, जो पर 14 मीटर के घेरे वाले तथा 75 से 80 मीटर तक ऊँचे पेड़ भी पाए जाए हैं।
देवदार एक बहुत बड़ा ऊंचा और सीधा पेड़ है। देवदार का तना बहुत मोटा और पत्ते हल्के हरे रंग के मुलायम और लंबे - गोल होते हैं। लकड़ी पीले रंग की सघन, सुगंधित, हल्की, मजबूत और रालयुक्त होती है। राल के कारण कीड़े और फफूँद नहीं लगते और जल का भी प्रभाव नहीं पड़ता, लकड़ी इमारत बनाने के लिए भी उपयोग होता है।
साथियों पहाड़ों में नर्सरी बहुत दूर होने की वजह से पौधे की व्यवस्था अपने आप करें। या जल्द व्यवस्था हो जाए तो आपको मंदिर परिसर में ही उचित मूल्य पर देवदार के पौधे मिल सकेंगे।
कुछ साल बाद आप खुद ही देखेंगे कि हमारा छोटा सा प्रयास नें कितना बड़ा, सुंदर पर्यटक स्थल बना दिया।
आशा है कि आप लोगों को यह सुझाव ठीक लगा होगा, तो समस्त क्षेत्रवासियों को जागरूक करें।
महाकाली सबको सतबुद्धि दे और अपना आशीर्वाद बनाए रखें।
जय महाकाली!
जय उत्तराखंड 


धन्यवाद!
लेखक: योग गुरु नरेश सिंह
गांव: तिमला खोली, जिला - पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड।

