हमारी संस्कृति के संवाहक,ढोल-दमाऊ वादक,जिन्हें हम स्थानीय भाषा में औजी(बाजन्तरी) कहते हैं,जिनके बिना यहाँ की संस्कृति अधूरी है,जिनके बिना हमारा कोई भी धार्मिक अनुष्ठान शुभ कार्य शादी-ब्याह,पूजा,कौथिग आदि संपन्न और पूर्ण नही हो सकते,जिनके हाथों की कला से ढोल-दमाऊ से निकली मधुर,चमत्कारी,जीवों में कंपन कर देने वाली दैवीय शक्ति से युक्त ध्वनि से हमारे पवित्र मंदिर,देव-थानों में आशिर्वाद देते देवताओं का प्रादुर्भाव होता है,जिन वाद्ययंत्रों से पूरे विश्व में उत्तराखण्ड संस्कृति की पहचान है,
ऐसे सभी ढोल-दमाऊं के वादकों को कोटि-कोटि प्रणाम व धन्यवाद।
माँ भगवती कालिंका आप सभी के परिवारों को सुख,समृद्धि,यश-वैभव प्रदान करे और अपना आशिर्वाद सदैव आप लोगों पर बनाए रखे।
आप लोग यूं ही उत्तराखण्ड की संस्कृति और परम्पराओं का निर्वहन और सेवा करते रहें।
इन्हीं कामनाओं के साथ एक बार पुनः आप लोगों को हृदय की गहराइयों से कोटि-कोटि प्रणाम व धन्यवाद आभार
Post by- जगमोहन पटवाल
थबड़िया मल्ला,बीरोंखाल
पौड़ी गढ़वाल

