सबसे बड़ा और स्पष्ट वरदान तो माँ वसुंधरा का ही है जो अपने अनमोल गुणों से सभी जीव-जंतुओं
नमस्कार
विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर आप सभी को बहुत-बहुत बधाई।
हमारे अधिकतर धार्मिक स्थल प्राकृतिक सुन्दरता के बीच स्थित है और बहुत पहले तक प्रदूषण मुक्त थे। वर्तमान में स्थिति बिल्कुल उलट है,लोग बड़ी संख्या में धार्मिक व अन्य पर्यटन स्थलों की ओर आते हैं व बहुत बड़ी मात्रा में अपने साथ खाध्य,पेय आदि सामाग्री जो कि अधिकांशतः प्लास्टिक के रैपरों से पैक किया होता है, को उपयोग करने के बाद उन्हीं जगहों पर छोड़ आते हैं।
बहुत समय बाद,कुछ दिन पहले मैं माँ भगवती कालिंका के दर्शनों के लिए गया मंदिर के आस-पास जंगलों में लोगों द्वारा छोड़े गए प्लास्टिक की थैलियों व पानी की बोतलें देखकर बहुत बुरा लगा।
प्रकृति को हमारे शास्त्रों में देवी का दर्जा दिया गया है हम इसकी भी पूजा करते हैं सबसे बड़ा और स्पष्ट वरदान तो माँ वसुंधरा का ही है जो अपने अनमोल गुणों से सभी जीव-जंतुओं का पालन कर रही है। क्या फायदा इन धार्मिक यात्राओं का एक ओर हम इन स्थानों पर मनोकामनाओं को लेकर जाते हैं और दूसरी ओर उनको गंदगी से पाट आते हैं।
इस प्रकार फैलाए गए प्लास्टिक से उनके नीचे आने वाले छोटे-छोटे सूक्ष्म जीवों व पौधों को जोकि प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं,को जीवित रहने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है,उनको सांस व प्रकाश नही मिल पाता,यह मनुष्य द्वारा किया गया सबसे बड़ा दोष है।
इस धरती पर सभी जीवों के जीने का बराबर अधिकार व प्राकृतिक निर्माण व संतुलन में बराबर का योगदान है।
इन सब में मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणियों में से एक है और प्रकृति को हो रहे नुकसान के कु-प्रभावों से भलीभांति परिचित है फिर अपने कुकृत्यों से बाज नहीं आता।
आप सभी से निवेदन है कि आप लोग अपने साथ ले जा रहे खाने-पीने की वस्तुओं के खाली प्लास्टिक रैपरों को अपने साथ वापस ले आएं वहां न छोड़े व इनका जहां तक संभव हो कम से कम उपयोग करें।
कूड़ा-करकट,प्लास्टिक से भरे जंगलों व गांव,शहरों में क्या अंतर रह जाएगा,मनुष्य अपने मनोरंजन और मन की शांति के लिए पर्यटन स्थलों और धार्मिक यात्राओं के लिए प्राकृतिक सुन्दरता के बीच जाता है ऐसे में वहां जाकर इस तरह के माहौल को देखकर कभी भी सुखी नही हो सकता है।
धन्यवाद 
जगमोहन पटवाल
थबड़िया मल्ला

