मंदिर में प्रसाद क्यों चढ़ाते हैं?
हमारे हिन्दू धर्म में भगवान को प्रसाद चढ़ाने या भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर और संध्या काल में पवित्र तन - मन से भगवान की पूजा अर्चना करने का रिवाज है पूजा पाठ करने के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं।
अधिकांश लोग रोजाना विधि-विधान से भगवान की पूजा भले ना करें, लेकिन अपने घर में भगवान को प्रसाद जरूर चढ़ाते है।
श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो कोई भक्त प्रेमपूर्वक मुझे फूल, फल, अन्न, जल, आदि अर्पण करता है। उसे मैं सगुण प्रकट होकर ग्रहण करता हूं।
भगवान की कृपा से जो जल और अन्न हमें प्राप्त होता है। उसे भगवान को अर्पित करना चाहिए और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए ही भगवान को भोग लगाया जाता है।
ऐसी मान्यता है कि भोग लगाने के बाद ग्रहण किया गया अन्न ,जल दिव्य हो जाता है उसको ग्रहण करने से हमारे अंदर सद्गुण, सद्भाव, सद्बुद्धि, दया, दान, आशीर्वाद और आरोग्य प्रदान होता है।
घर में जो कुछ उपलब्ध हो उसी का भोग लगाना उचित माना जाता है प्रसाद का क्रय - विक्रय करना वर्जित माना गया है लेकिन वर्तमान समय में लगभग हमें सब कुछ तो बाहर से ही खरीदना पड़ रहा है।
दोस्तों हमारा गढ़वाल और कुमाऊं बॉर्डर का महाकाली मंदिर भी आस्था का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।
महाकाली मंदिर में प्रसाद के लिए मेरा एक सुझाव है कि कुछ खास चौलाई के लड्डू का प्रसाद का प्रचलन हो। माता के दर्शनों बाद भक्तजन अपने घर परिवार के लिए माता का प्रसाद लेकर जरूर जाएंगे।
चौलाई का लड्डू कई दिन तक बिना फ्रिज के खराब नहीं होता।
यह लड्डू गांव के महिलाओं द्वारा उचित मात्रा में बनाए जा सकते हैं, क्योंकि गांव में ही चौलाई (चुवा), देसी घी उचित मात्रा में उपलब्ध होता है और गुड़ बाहर से मंगाना पड़ेगा। इससे गांव के उन महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा जिनका कमाई का कोई साधन नहीं है।
कुछ ही दिनों में इन लड्डू की डिमांड बढ़ती जाएगी, महाकाली की कृपा से एक दिन यह चौलाई के लड्डू का प्रसाद फेमस हो जाएगा और लोग देश परदेश भी ले जा सकेंगे।
अगर आपको यह सुझाव अच्छा लगा हो तो सभी महाकाली क्षेत्रवासियों को जागरूक करें।
धन्यवाद।
जय महाकाली 

लेखक: योग गुरु नरेश सिंह
गांव: तिमला खोली, जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

